एक फोन, एक फरिश्ता और एक मां की बची जिंदगी: 12वीं बार रक्तदान कर राजकुमार अग्रवाल ने लिखी इंसानियत की नई कहानी*
*पिथौरा संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर की रिपोर्ट।* दोपहर को मोबाइल की घंटी बजी। दूसरी तरफ से घबराई हुई आवाज आई - "भैया, एक गर्भवती महिला को तुरंत खून की जरूरत है, हालत नाजुक है..."
ज्यादातर लोग ऐसे में पहला सवाल पूछते हैं - कौन है? कहां की है? किस जाति, किस धर्म की है? अपना है या पराया?
लेकिन बसना के पत्रकार राजकुमार अग्रवाल ने एक सवाल भी नहीं पूछा। सिर्फ इतना कहा - "मैं आ रहा हूं।"
यह एक रक्तदान नहीं था, यह एक अनजान मां और उसके होने वाले बच्चे के लिए उम्मीद की किरण थी। 13 सितंबर 2026 को राजकुमार अग्रवाल ने 12वीं बार अपना रक्त दान किया और एक बार फिर साबित कर दिया कि पत्रकारिता सिर्फ खबर लिखना नहीं, खबर बनना भी है।
*जब इंसानियत ने दी जात-पात को मात*
अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी वह गर्भवती महिला उनके लिए पूरी तरह अनजान थी। न नाम पता था, न गांव। पता था तो सिर्फ एक बात - एक मां को जीना है, एक बच्चे को दुनिया में आना है।
बिना देर किए वे ब्लड बैंक पहुंचे और रक्तदान किया। डॉक्टरों के मुताबिक समय पर रक्त मिलने से जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा टल गया।
*रक्तवीर ने कहा - पहले जिंदगी, सवाल बाद में*
रक्तदान के बाद राजकुमार अग्रवाल ने जो कहा, वह हर युवा को सोचने पर मजबूर कर देगा।
उन्होंने कहा, "रक्तदान पहचान देखकर नहीं, जरूरत देखकर किया जाना चाहिए। हमारा 350 मिली खून किसी के लिए पूरी जिंदगी बन सकता है। जब हम खून देते हैं तो सिर्फ खून नहीं देते, किसी परिवार को उसकी मुस्कान लौटाते हैं, किसी बच्चे को उसकी मां की गोद देते हैं। कौन है, कहां से है, अपना है या अनजान - यह सवाल बाद में है, पहले जिंदगी बचाना जरूरी है।"
*12 बार रक्तदान, 12 बार जीवनदान*
यह पहला मौका नहीं है। राजकुमार अग्रवाल अब तक 12 बार रक्तदान कर चुके हैं। हर बार किसी अनजान की मदद के लिए। आज के समय में जब लोग अपनों के लिए भी रक्त देने से कतराते हैं, ऐसे में एक व्यक्ति का निस्वार्थ भाव से 12 बार रक्तदान करना, समाज के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं।
स्थानीय लोगों ने उनके इस जज्बे को सलाम किया है। सच ही कहा गया है - रक्तदाता किसी फरिश्ते से कम नहीं होते, बस फर्क इतना है कि उनके पंख नहीं दिखते।
