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जुलाई 02, 2026

जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती

जुलाई 02, 2026
जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती
जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती
जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती
जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती

 आरंग के लिंगाडीह में भ्रमण एवं प्रशिक्षण, 80 प्रगतिशील किसानों ने लिया हिस्सा


मखाना की खेती किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर - चंद्रहास चंद्राकर


कृषि वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर तथा कृषि विशेषज्ञ  रविकांत साहू भी उपस्थित रहे




महासमुंद संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर/ धान के कटोरे के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में अब सुपर फूड मखाना किसानों के लिए आय का नया और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है। इसी उद्देश्य से उद्यानिकी विभाग महासमुंद द्वारा विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह में 1 जुलाई 2026 को मखाना खेती पर भ्रमण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें महासमुंद एवं पिथौरा विकासखंड के 80 प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर मखाना की वैज्ञानिक खेती, बीज उत्पादन एवं प्रसंस्करण की जानकारी प्राप्त की।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम लिमिटेड के अध्यक्ष  चंद्रहास चंद्राकर ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य में मखाना की व्यावसायिक खेती की शुरुआत विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह के प्रगतिशील किसान स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार चंद्राकर ने की थी। उन्होंने बताया कि राज्य का पहला मखाना प्रसंस्करण केंद्र 5 दिसंबर 2021 को लिंगाडीह में स्थापित किया गया, जिससे किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर सृजित हुए हैं। कार्यक्रम में आरंग जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष श्री रवीन्द्र (रिंकू) चंद्राकर, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर तथा कृषि विशेषज्ञ श्री रविकांत साहू भी उपस्थित रहे।प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के मखाना बीज उत्पादन केंद्र का भ्रमण किया। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर ने बताया कि मखाना छह माह की अवधि वाली जलीय फसल है, जिसमें प्रति एकड़ लगभग 20 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है तथा औसतन 8 से 10 क्विंटल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप बेहद कम होता है और चोरी की संभावना भी नगण्य रहती है। उन्होंने प्रसंस्करण की जानकारी देते हुए बताया कि एक किलोग्राम मखाना बीज से लगभग 200 से 250 ग्राम पॉप तैयार होता है, जिसकी बाजार में कीमत 700 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलती है। यदि किसान स्वयं प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग कर विपणन करें तो प्रति एकड़ अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने मखाना खेती को भविष्य की लाभकारी फसल बताते हुए इसे अपनाने में उत्साह दिखाया। उद्यानिकी विभाग महासमुंद की सहायक संचालक श्रीमती पायल साव के निर्देशन में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित उद्यानिकी अधिकारियों एवं किसानों ने मखाना की खेती को अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में श्री रविकांत साहू ने जैविक खेती के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर डॉ. अकानंद ढीमर, डॉ. योगेन्द्र चंदेल, प्रबंधक श्री संजय नामदेव तथा श्री शिव साहू सहित अन्य अधिकारी एवं किसान उपस्थित रहे।


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जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती

जुलाई 02, 2026
जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती
जिले के किसानों ने सीखी सुपर फूड मखाना की वैज्ञानिक खेती
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 आरंग के लिंगाडीह में भ्रमण एवं प्रशिक्षण, 80 प्रगतिशील किसानों ने लिया हिस्सा


मखाना की खेती किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर - चंद्रहास चंद्राकर


कृषि वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर तथा कृषि विशेषज्ञ  रविकांत साहू भी उपस्थित रहे




महासमुंद संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर/ धान के कटोरे के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में अब सुपर फूड मखाना किसानों के लिए आय का नया और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है। इसी उद्देश्य से उद्यानिकी विभाग महासमुंद द्वारा विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह में 1 जुलाई 2026 को मखाना खेती पर भ्रमण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें महासमुंद एवं पिथौरा विकासखंड के 80 प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर मखाना की वैज्ञानिक खेती, बीज उत्पादन एवं प्रसंस्करण की जानकारी प्राप्त की।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम लिमिटेड के अध्यक्ष  चंद्रहास चंद्राकर ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य में मखाना की व्यावसायिक खेती की शुरुआत विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह के प्रगतिशील किसान स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार चंद्राकर ने की थी। उन्होंने बताया कि राज्य का पहला मखाना प्रसंस्करण केंद्र 5 दिसंबर 2021 को लिंगाडीह में स्थापित किया गया, जिससे किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर सृजित हुए हैं। कार्यक्रम में आरंग जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष श्री रवीन्द्र (रिंकू) चंद्राकर, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर तथा कृषि विशेषज्ञ श्री रविकांत साहू भी उपस्थित रहे।प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के मखाना बीज उत्पादन केंद्र का भ्रमण किया। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर ने बताया कि मखाना छह माह की अवधि वाली जलीय फसल है, जिसमें प्रति एकड़ लगभग 20 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है तथा औसतन 8 से 10 क्विंटल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप बेहद कम होता है और चोरी की संभावना भी नगण्य रहती है। उन्होंने प्रसंस्करण की जानकारी देते हुए बताया कि एक किलोग्राम मखाना बीज से लगभग 200 से 250 ग्राम पॉप तैयार होता है, जिसकी बाजार में कीमत 700 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलती है। यदि किसान स्वयं प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग कर विपणन करें तो प्रति एकड़ अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने मखाना खेती को भविष्य की लाभकारी फसल बताते हुए इसे अपनाने में उत्साह दिखाया। उद्यानिकी विभाग महासमुंद की सहायक संचालक श्रीमती पायल साव के निर्देशन में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित उद्यानिकी अधिकारियों एवं किसानों ने मखाना की खेती को अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में श्री रविकांत साहू ने जैविक खेती के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर डॉ. अकानंद ढीमर, डॉ. योगेन्द्र चंदेल, प्रबंधक श्री संजय नामदेव तथा श्री शिव साहू सहित अन्य अधिकारी एवं किसान उपस्थित रहे।


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मखाना की खेती किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर - चंद्रहास चंद्राकर


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महासमुंद संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर/ धान के कटोरे के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में अब सुपर फूड मखाना किसानों के लिए आय का नया और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है। इसी उद्देश्य से उद्यानिकी विभाग महासमुंद द्वारा विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह में 1 जुलाई 2026 को मखाना खेती पर भ्रमण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें महासमुंद एवं पिथौरा विकासखंड के 80 प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर मखाना की वैज्ञानिक खेती, बीज उत्पादन एवं प्रसंस्करण की जानकारी प्राप्त की।

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मखाना की खेती किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर - चंद्रहास चंद्राकर


कृषि वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर तथा कृषि विशेषज्ञ  रविकांत साहू भी उपस्थित रहे




महासमुंद संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर/ धान के कटोरे के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में अब सुपर फूड मखाना किसानों के लिए आय का नया और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है। इसी उद्देश्य से उद्यानिकी विभाग महासमुंद द्वारा विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह में 1 जुलाई 2026 को मखाना खेती पर भ्रमण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें महासमुंद एवं पिथौरा विकासखंड के 80 प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर मखाना की वैज्ञानिक खेती, बीज उत्पादन एवं प्रसंस्करण की जानकारी प्राप्त की।

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 आरंग के लिंगाडीह में भ्रमण एवं प्रशिक्षण, 80 प्रगतिशील किसानों ने लिया हिस्सा


मखाना की खेती किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर - चंद्रहास चंद्राकर


कृषि वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर तथा कृषि विशेषज्ञ  रविकांत साहू भी उपस्थित रहे




महासमुंद संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर/ धान के कटोरे के रूप में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ में अब सुपर फूड मखाना किसानों के लिए आय का नया और लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है। इसी उद्देश्य से उद्यानिकी विभाग महासमुंद द्वारा विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह में 1 जुलाई 2026 को मखाना खेती पर भ्रमण एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें महासमुंद एवं पिथौरा विकासखंड के 80 प्रगतिशील किसानों ने भाग लेकर मखाना की वैज्ञानिक खेती, बीज उत्पादन एवं प्रसंस्करण की जानकारी प्राप्त की।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम लिमिटेड के अध्यक्ष  चंद्रहास चंद्राकर ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि राज्य में मखाना की व्यावसायिक खेती की शुरुआत विकासखंड आरंग के ग्राम लिंगाडीह के प्रगतिशील किसान स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार चंद्राकर ने की थी। उन्होंने बताया कि राज्य का पहला मखाना प्रसंस्करण केंद्र 5 दिसंबर 2021 को लिंगाडीह में स्थापित किया गया, जिससे किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर सृजित हुए हैं। कार्यक्रम में आरंग जनपद पंचायत के उपाध्यक्ष श्री रवीन्द्र (रिंकू) चंद्राकर, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर तथा कृषि विशेषज्ञ श्री रविकांत साहू भी उपस्थित रहे।प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के मखाना बीज उत्पादन केंद्र का भ्रमण किया। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गजेन्द्र चंद्राकर ने बताया कि मखाना छह माह की अवधि वाली जलीय फसल है, जिसमें प्रति एकड़ लगभग 20 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है तथा औसतन 8 से 10 क्विंटल उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप बेहद कम होता है और चोरी की संभावना भी नगण्य रहती है। उन्होंने प्रसंस्करण की जानकारी देते हुए बताया कि एक किलोग्राम मखाना बीज से लगभग 200 से 250 ग्राम पॉप तैयार होता है, जिसकी बाजार में कीमत 700 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिलती है। यदि किसान स्वयं प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग कर विपणन करें तो प्रति एकड़ अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने मखाना खेती को भविष्य की लाभकारी फसल बताते हुए इसे अपनाने में उत्साह दिखाया। उद्यानिकी विभाग महासमुंद की सहायक संचालक श्रीमती पायल साव के निर्देशन में आयोजित कार्यक्रम में उपस्थित उद्यानिकी अधिकारियों एवं किसानों ने मखाना की खेती को अपनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम में श्री रविकांत साहू ने जैविक खेती के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर डॉ. अकानंद ढीमर, डॉ. योगेन्द्र चंदेल, प्रबंधक श्री संजय नामदेव तथा श्री शिव साहू सहित अन्य अधिकारी एवं किसान उपस्थित रहे।

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जुलाई 01, 2026

बसना ग्राम बड़ेडाभा प्राथमिक शिक्षा वाले ग्रामीण ने खड़े कर दिए हजारों पेड़, सरकार की नीतियों को भी दिखा रहे राह

जुलाई 01, 2026
बसना ग्राम बड़ेडाभा प्राथमिक शिक्षा वाले ग्रामीण ने खड़े कर दिए हजारों पेड़, सरकार की नीतियों को भी दिखा रहे राह





बसना संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर
/आज के इस भौतिकवादी युग में, जहाँ इंसान आधुनिकता की अंधी दौड़ में प्रकृति को नुकसान पहुँचाने से बाज नहीं आ रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना विकासखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो समाज को एक नई दिशा दे रही है। बसना ब्लॉक से महज 8 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम बड़ेडाभा के रहने वाले पूरन निषाद ने अपनी जिंदगी का एक ही मकसद बना लिया है—पर्यावरण का संरक्षण।

पूरन निषाद ने भले ही केवल प्राथमिक शाला (प्राइमरी स्कूल) तक की पढ़ाई की है, लेकिन उनकी सोच और उनके काम बड़ी-बड़ी डिग्रियां रखने वालों के लिए एक मिसाल हैं। उन्होंने अपनी बाकी की जिंदगी पेड़ों को समर्पित कर दी है और आज उनके इस छोटे से प्रयास ने एक बड़ा आकार ले लिया है।

पूरन निषाद की मेहनत का ही नतीजा है कि आज बड़ेडाभा और उसके आसपास लगभग 1,000 पेड़ बड़े हो चुके हैं। इनमें से कई फलदार वृक्ष अब फल भी देने लगे हैं। पूरन का यह प्रयास सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे उन पारंपरिक और औषधीय पेड़ों को बचाने की मुहिम में जुटे हैं जो धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर हैं।

*वे विशेष रूप से इन वृक्षों को सहेज रहे हैं*

पारंपरिक व छायादार वृक्ष- पीपल, बरगद, फलदार व विलुप्तप्राय वृक्ष- आम, अमरूद, आंवला, जामुन और गशती

पूरन निषाद का यह अभियान सरकार और वन विभाग की नीतियों पर भी एक बड़ा वैचारिक सवाल खड़ा करता है। उनका मानना है कि आज सरकारें सड़कों के किनारे सिर्फ विदेशी प्रजाति के पेड़ों (जैसे गुलमोहर, यूकेलिप्टस आदि) को बढ़ावा दे रही हैं, जो सिर्फ दिखावे और छाया के काम आते हैं।

पूरन निषाद सरकार को याद दिलाते हैं कि सड़कों के किनारे विदेशी पेड़ों की जगह फलदार और स्वदेशी वृक्ष लगाए जाने चाहिए। इसके पीछे उनका एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक तर्क है कि 

फलदार वृक्ष न केवल इंसानों को फल देते हैं, बल्कि जैव विविधता (Biodiversity) को भी बनाए रखते हैं। इन पेड़ों पर अनगिनत छोटे जीव-जंतु, पक्षी और कीट-पतंगे अपना जीवन बसर करते हैं, जिससे हमारा पूरा ईकोसिस्टम सुरक्षित रहता है।

इतने बड़े स्तर पर नि:स्वार्थ भाव से काम करने के बावजूद पूरन निषाद को प्रशासन या समाज से वह प्रोत्साहन और मदद नहीं मिल पा रही है, जिसकी वे उम्मीद रखते हैं। सरकारी विभागों की बेरुखी के बाद भी उनके हौसले डगमगाए नहीं हैं।

पूरन निषाद का यह कदम आज के युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और मौसम चक्र में आ रहे बदलावों से जूझ रही है, ऐसे में बड़ेडाभा के इस ग्रीन हीरो का प्रयास भले ही छोटा लगे, लेकिन पर्यावरण को बचाने और धरती को हरा-भरा रखने का उनका यह संकल्प वाकई वंदनीय है।




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2026-07-01T19:29:37+05:30
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सेवानिवृति पर राज्यपाल पुरस्कृत प्रधानपाठक छबिराम पटेल को भावभीनी दी गई विदाई

जुलाई 01, 2026



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पिथौरा संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर/ शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला ठाकुरदिया कला में लंबे समय तक  पदस्थ राज्यपाल पुरस्कृत प्रधान पाठक एवं लेखक छबिराम पटेल को सेवा का 62 वर्ष पूरा करने एवं अधिवार्षिकी पूर्ण करने पर उन्हें 30 जून को शिक्षकों,ग्रामवासियों एवं स्कूली बच्चों द्वारा बैंड बाजा के साथ ससम्मान विदाई दी गई। मिडिल स्कूल में आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में प्रधान पाठक छबिराम पटेल एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में कौहाकुड़ा हायर सेकेंडरी के प्राचार्य बी के बघेल,कर्मचारी अधिकारी फेडरेशन के ब्लाक अध्यक्ष उमेश दीक्षित, तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के सचिव लेखराम साहू, संकुल समन्वयक नितेश साहू,सरपंच श्रीमती दिलेश्वरी दीवान,शाला विकास समिति अध्यक्ष यशवंत दीवान, उपाध्यक्ष श्रीमती पालकी दीवान,पूर्व सरपंच भानूराम ठाकुर, वरिष्ठ सदस्य मेलाराम ठाकुर,मनोज दीवान, केशर कुमार ठाकुर,व्याख्याता सुशील ओगरे,के पी पटेल , दिनेश कुमार निर्मलकर एवं बड़ी संख्या में स्कूली बच्चे और ग्रामवासी उपस्थित रहे। इस दौरान विदाई एवं सम्मान समारोह को प्राचार्य बी के बघेल, फेडरेशन ब्लाक अध्यक्ष उमेश दीक्षित, सरपंच श्रीमती दिलेश्वरी दीवान, पूर्व सरपंच भानूराम ठाकुर ने संबोधित करते हुए कहा कि बहुप्रतिभा के धनी प्रधान पाठक छबिराम पटेल ने अपने ऊंचालीस साल नौ माह और नौ दिन के सेवाकाल में शैक्षणिक कार्यों को बखूबी संचालित करके  वे एक विशिष्ट पहचान बना कर

शिक्षकों के लिए प्रेरणास्रोत रहे। उन्होंने शिक्षा, समाज और साहित्य सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। कार्यक्रम के बाद ग्रामवासियों ने स्कूली बच्चों के साथ बैंड बाजे के साथ ग्राम के अंतिम छोर तक जाकर अपने पटेल सर को विदा किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में शिक्षक मोहितराम पटेल, मुकेशकुमार सिन्हा, दिनेश कुमार निर्मलकर, प्रदीप कुमार पटेल, भागीरथी दीवान, तुलसी राम पटेल, पुकराम कुर्रे, कुसुम लता कुर्रे, हिरेंद्र दीवान, योगेश्वर साहू, रोशन डडसेना, कोमल प्रसाद पुरैना एवं ग्रामवासियों में मनोज दीवान, लेखराज बरिहा,अनूप ध्रुव, कलश राम चौहान, मंटोरी दीवान, तिलक राम दीवान सहित उपस्थित सभी ग्रामीणों का सराहनीय योगदान रहा।कार्यक्रम का कुशल संचालन शिक्षक दिनेश कुमार निर्मलकर एवं आभार प्रदर्शन कुसुम लता कुर्रे ने किया।







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