पिथौरा संस्कार न्यूज़ गौरव चंद्राकर /बच्चे भविष्य का द्वार होते है,बच्चो के लिए समय-समय पर क़ानून बनाये गये है, जिसका पालन सुनिश्चित करना हम सब का दायित्व एवम् कर्तव्य होता है,उक्ताशय की बातें विधिक सेवा दिवस के अवसर पर व्यवहार न्यायालय पिथौरा के न्यायाधीश प्रतीक टेम्भुरकर ने आयोजित शिविर में व्यक्त किए ।
राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस पर कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय पर स्थानीय न्यायालय द्वारा शिविर का आयोजन किया गया था इस अवसर पर न्यायाधीश टेम्भुरकर ने कहा कि हर साल भारत में 9 नवम्बर को राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस मनाया जाता है। इस दिन देश के सभी नागरिकों को उचित, निष्पक्ष और न्याय प्रक्रिया सुनिश्चित करने हेतु जागरूक किया जाता है। राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस को मनाए जाने का मुख्य उद्देश्य गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों के समक्ष नि: शुल्क दी जाने वाली प्रवीण और कानूनी सेवाओं के बारे में अवगत कराना है। इस दिन को मनाए जाने की शुरुआत साल 1995 में की गई थी। तब से हर साल 9 नवम्बर को इस दिन का आयोजन भारत के सर्वोच्च न्यायालय यानि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों को न्यायायिक सहायता और समर्थन देने के लिए किया गया था।
राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस क्यों है खास?
श्री टेम्भुरकर ने बताया कि राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस इसलिए खास माना जाता है क्योंकि आज के दिन विधिक सेवा के तहत प्राधिकरण अधिनियम और वादिकारियों के अधिकार को सभी प्रावधानों से अवगत कराया जाता है। इस दिन को मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य देश के कमजोर वर्ग के लोगों तक सभी प्रकार की क़ानूनी सेवाओं को नि: शुल्क पहुँचाना है। इस दिन यह प्रयास किया जाता है कि मुफ्त सेवाओं के साथ ही उन्हें अपने अधिकारों के बारे में भी जागरूक किया जाए। इसी उद्देश्य को लेकर आज की शिविर का आयोजन किया गया है उन्होंने निःशुल्क विधिक सेवाएं देने वाले संस्थान के बारे में भी जानकारी देते हुए बताया कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर निःशुल्क विधिक सेवाएं दी जाती हैं।राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण का काम राज्य स्तर पर इस काम की देखरेख करना है।राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के द्वारा जिला स्तर पर विधिक सेवाएं दी जाती है।तालुका स्तर पर सेवा देने का काम तालुक विधिक सेवा प्राधिकरण के द्वारा होता है। उन्होंने यह भी बताया कि प्रत्येक स्तर पर जानकारी उपलब्ध कराने की सुविधा होती है ।
निःशुल्क क़ानून के बारे में दी गई जानकारी-
न्यायाधीश ने कहा कि जिन लोगों के पास न्यायालय जाकर अपनी कानूनी समस्या को रखने के लिए धन नहीं हो, उन्हें बिना पैसे लिए या बहुत कम पैसे में कानूनी सहायता करना विधिक सहायता (Legal aid) कहलाता है। कानूनी सहायता देना, विधिक समता के लिए बहुत आवश्यक तत्त्व है क्योंकि निर्धनता के कारण कोई न्याय न प्राप्त कर पाए तो विधिक समता का कोई अर्थ नहीं है।
बाल विवाह क़ानून को विस्तार से समझाया
विश्व के कई देशों में ऐसी कई प्रथाएं हैं, जो आज के समय में लोगों के लिए समस्या बन चुकी है। इसमें से कई ऐसी प्रथाएं, जो महिला वर्ग के लिए चुनौती बन गया है। इन्हीं में से एक प्रथा है बाल विवाह।कानून के अनुसार, निश्चित आयु से पहले किसी भी बच्चे का विवाह यानि नाबालिग उम्र में बच्चे का विवाह कर देना बाल विवाह होता है। प्रत्येक देश में बच्चे के बालिग होने की एक आयु निश्चित की गई है, उससे पहले विवाह होना, बाल विवाह कहलाता है। इस विवाह से बच्चों का बचपन छिन जाता है और उन्हें इस बात का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं होता है कि आगे उनके साथ क्या होने वाला है या उनका जीवन कैसा हो जाएगा।इस प्रथा का शिकार ज्यादातर लड़कियां होती हैं, क्योंकि कई मामलों में देखा गया है कि लड़कियों की उम्र बहुत ही कम होती है और लड़कों की उम्र उनके मुकाबले बहुत ही ज्यादा होती है। इस तरह की शादी से लड़कियों को जीवन भर मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। भारत में कानूनी दृष्टि से 18 वर्ष से कम आयु की लड़की और 21 वर्ष से कम आयु के लड़के का विवाह करना बाल विवाह की श्रेणी में आता है, जो कि कानूनी अपराध है।
बालश्रम के बारे भी अवगत कराया गया
न्यायाधीश टेम्भुरकर ने बताया कि बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन क़ानून सभी व्यवसायों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है।ये कानून, रोजगार के लिए कुछ छूट देते हुए, यह अनिवार्य बनाता है कि बच्चा केवल स्कूल के घंटों के बाद या छुट्टियों के दौरान ही अपने परिवार और पारिवारिक उद्यम में मदद कर सकता है। स्कूल के दिनों में कोई भी परिवार अपने बच्चों को नौकरी पर नहीं रख सकता।
यदि कोई परिवार या नियोक्ता कानून का उल्लंघन की स्थिति में केवल नियोक्ता को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। उसे जुर्माने के रूप में 50,000 रुपये तक का भुगतान करना पड़ सकता है और छह महीने से दो साल तक की कैद हो सकती है। बाद के अपराध के लिए, जुर्माना एक से तीन साल के बीच कारावास का प्रावधान है ।

