जहां संगीत है वहां संवेदना है और जहां संवेदना है वहीं मानवता है : नारायण नामदेव
महासमुंद सस्कार न्यूज़ गौरव चद्राकर /राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) छत्तीसगढ़ प्रांत के 15 दिवसीय प्रांतीय घोष वर्ग (संगीत शिविर) का समापन रविवार को स्थानीय सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में हुआ। 10 मई से शुरू हुए इस कड़े प्रशिक्षण शिविर के अंतिम दिन स्वयंसेवकों ने एक से बढ़कर एक सुमधुर और राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत रचनाओं का प्रदर्शन किया। स्वयंसेवकों की इन प्रस्तुतियों से पूरा परिसर देशप्रेम के सुरों से गुंजायमान हो उठा।
समापन समारोह की अध्यक्षता महासमुंद जिला राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेश जैन (बागबाहरा) ने की। कार्यक्रम में जिला संघ चालक महेश चंद्राकर बतौर अतिथि शामिल हुए, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में छत्तीसगढ़ प्रांत के सह प्रांत प्रचारक नारायण नामदेव उपस्थित रहे। समारोह को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता नारायण नामदेव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचार-पद्धति और कार्य विस्तार पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि, संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण और समाज को संगठित करना है। ईश्वर ने हमें मानव जीवन दिया है, जिसके लिए हमें कृतज्ञ होना चाहिए। हमारा मनुष्य जन्म इसलिए भी श्रेष्ठ है क्योंकि हमने भारत भूमि पर जन्म लिया है। मां भारती ने हमेशा महान संतों और क्रांतिकारियों को जन्म दिया है। हमें विचार करना चाहिए कि हमारा जीवन भी उन्हीं महापुरुषों की तरह सार्थक बने। मनुष्य होने के साथ-साथ संघ का स्वयंसेवक होना हमारे लिए गौरव की बात है। उन्होंने संगीत के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि संगीत का नाम सुनते ही हमारे भीतर उत्साह का संचार हो जाता है। भारतीय पारंपरिक संगीत मनुष्य के जीवन में अद्भुत ऊर्जा भरता है। हमारे देवी-देवताओं के हाथों में भी वाद्य यंत्र हैं, जो यह दर्शाते हैं कि संगीत जीवन को मधुर बनाता है। संगीत मन और बुद्धि को शुद्ध कर आनंदित करता है। स्वामी विवेकानंद, तानसेन और मीराबाई ने संगीत को ही अपना माध्यम बनाया था। संगीत से भक्ति, करुणा, वीरता और शांति के भाव पैदा होते हैं। भारतीय संगीत केवल एक कला नहीं, बल्कि आत्मा है। यह लोगों को आपस में जोड़ने का काम करता है और तनाव, चिंता तथा थकान को मिटाता है। उन्होंने आगे कहा कि इन 15 दिनों में सभी शिक्षार्थियों ने कई कठिन रचनाएँ सीखी हैं। संघ का स्वयंसेवक जो ठान लेता है, उसे पूरा करके ही रहता है। मन को साधने का यह काम संघ की शाखाओं में होता है। संघ की 100 वर्षों की यात्रा सरल नहीं बल्कि बेहद कठिन रही है। अनेक कष्ट सहते हुए भी स्वयंसेवकों ने कार्य जारी रखा, जिसके परिणामस्वरूप आज देश भर में 90 हजार से अधिक शाखाएं लग रही हैं और संघ समाज में व्यवस्था लाने का कार्य कर रहा है।
छत्तीसगढ़ के सभी जिलों से 110 शिक्षार्थियों ने लिया हिस्सा*
शाम ठीक 6 बजे शुरू हुए इस प्रदर्शन कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में नगर के गणमान्य नागरिक और आमजन उपस्थित थे। पूर्ण अनुशासन और तालबद्धता के साथ जब स्वयंसेवकों ने कदमताल करते हुए वाद्यों की प्रस्तुति दी, तो उपस्थित जनसमूह ने करतल ध्वनि से उनका उत्साहवर्धन किया। इस प्रांतीय शिविर में छत्तीसगढ़ के सभी जिलों से चयनित 110 शिक्षार्थी स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया। साथ ही, प्रशिक्षण को सफल बनाने में 18 प्रशिक्षक और 40 व्यवस्थापक स्वयंसेवक भी जुटे रहे।
पारंपरिक वाद्य यंत्रों की रचनाओं का किया सामूहिक वादन*
शिविर के दौरान स्वयंसेवकों को संघ के पारंपरिक वाद्य यंत्रों के वादन का कड़ा अभ्यास कराया गया था। समापन समारोह में स्वयंसेवकों ने सामूहिक रूप से 'घोष' के अंतर्गत बांसुरी (वंशी), शंख, आनक (ड्रम) और प्रणव (साइड ड्रम) जैसे विभिन्न वाद्य यंत्रों पर संघ की तकनीकी व सुमधुर रचनाओं का शानदार प्रदर्शन किया। स्वयंसेवकों की जुगलबंदी और सुरों के इस अद्भुत समन्वय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस राष्ट्रभक्ति से सराबोर कार्यक्रम में शहर के प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता और मातृशक्ति बड़ी संख्या में मौजूद थे।
via Blogger https://www.sanskar.live/2026/05/blog-post_25.html
2026-05-25T07:31:24+05:30






.jpeg)